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विमर्श खुद से, कविताएं (वैभव बेख़बर)

 फ़रेबी   सलीके   गढ़े  जा  रहे  हैं सो  फ़र्ज़ी  क़सीदे पढ़े जा  रहे  हैं, नहीं  जानते  क्या  सही  रास्ता  है सभी  आगे-आगे  बढ़े  जा  रहे  हैं, लड़ाई को जायज़ समझते हैं शायद बिना ही  वज़ह  के  लड़े  जा रहे  हैं, के जिनका जमीं पे  नही है ठिकाना नए  पँख   पाकर   उड़े  जा  रहे  हैं! 0 हर मुश्किल राह से हम  निकल  गए पर  मंज़िल  पे   आके  फिसल  गए मौसम  के   जैसे ,  लोग  तो  न  थे लेकिन  पल भर में   सारे  बदल गए 0 एक नास्तिक की पीड़ा यही है कि वह एक लोकतांत्रिक देश में मनगढ़ंत लोककथाओं वाली पाखण्डवादी, और रीतिरिवाजी शोषित सामाजिक व्यवस्था के धार्मिक जुल्मोसितम,अत्याचार, आतंकवाद के बीच  जी रहा है! वसीले आसमानी किताबों के वह देख रहा ईश्वर के नाम पर चल रहे धार्मिक धंधों को, ना चाहते हुए भी सुन रहा है आरत...