विमर्श खुद से, कविताएं (वैभव बेख़बर)

 फ़रेबी   सलीके   गढ़े  जा  रहे  हैं

सो  फ़र्ज़ी  क़सीदे पढ़े जा  रहे  हैं,

नहीं  जानते  क्या  सही  रास्ता  है
सभी  आगे-आगे  बढ़े  जा  रहे  हैं,

लड़ाई को जायज़ समझते हैं शायद
बिना ही  वज़ह  के  लड़े  जा रहे  हैं,

के जिनका जमीं पे  नही है ठिकाना
नए  पँख   पाकर   उड़े  जा  रहे  हैं!

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हर मुश्किल राह से हम  निकल  गए
पर  मंज़िल  पे   आके  फिसल  गए

मौसम  के   जैसे ,  लोग  तो  न  थे
लेकिन  पल भर में   सारे  बदल गए

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एक नास्तिक की पीड़ा यही है
कि वह एक लोकतांत्रिक देश में
मनगढ़ंत लोककथाओं वाली
पाखण्डवादी, और रीतिरिवाजी
शोषित सामाजिक व्यवस्था के
धार्मिक जुल्मोसितम,अत्याचार,
आतंकवाद के बीच  जी रहा है!

वसीले आसमानी किताबों के
वह देख रहा ईश्वर के नाम पर
चल रहे धार्मिक धंधों को,
ना चाहते हुए भी सुन रहा है
आरती और अज़ानों को,
समझ रहा है कि कैसे
बाटा गया है जाति-धर्म-पंथ
में इंसानों को

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श्रेष्ठतम होने से पहले ही
हज़ारों कलायें बेरोजगारी में
अपना दम तोड़ देती हैं,
क्योंकि
समाज सिर्फ़ श्रेष्ठ कलाकार
को मेहनताना देता है,
जबकि हज़ार लोगों में से किसी
एक के पास ही नैसर्गिक कला
होती है

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मैंने  थोड़ी   शराब   पी  ली   है
चीज  तू   भी  बड़ी  नशीली  है,

आग  लगती  है  किसमें  देखेंगें
मेरी  माचिस  में   एक तीली  है,

भीड़   है   आस-पास   लोगों की
जान  फिर  भी  बहुत  अकेली है,

दाम   हर   चीज   के    बतायेंगे
जिनकी  शौहरत   नई  नवेली  है,

फ़ूल  गेंदे  के  देके  बोला  वाइज़
दूसरे   धर्म     की    चमेली   है,

उलझे  उलझे  से  इसके  धागे  है
ज़िन्दगी  इक  अजब   पहेली  है!

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सच को अक्सर  झुठलाता है
जब  मानव  जाल बिछाता है,

सब कहते  हैं  भीड़  बहुत  है
राह   नई     कौन   बनाता  है,

सब   नाम  के   साथी  होते हैं
बस  मतलब  साथ  निभाता है,

लुट  जाता ,  वो  भोलेपन  में
जो  मेहनत  करके   खाता  है,

दुख  ही  दुख है इस  जीवन में
मेरा     अनुभव    बतलाता   है,

अपनों से   ये   जग   बैर  करे
गैरों     से   रखता    नाता  है,

गाँवों ,   गाँवों    में   निर्धन  है
जो  भारत   भाग्य  विधाता  है!


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मैं इंसान हूँ झूठ है
मैं शैतान हूँ झूठ है
पारसी,ईसाई, हिन्दू
मुसलमान हूँ ये भी झूठ है
हर संबंध झूठ है
हर व्यवहार झूठ है
सुनहरे ख़्वाब के मानिंद
ये  संसार  झूठ  है
रस्ता भी झूठ  है
मंज़िल भी झूठ है
भीतर भी झूठ है
बाहर  भी झूठ है
क्योंकि सच के हिस्से में
कोई ज़िन्दगी नहीं होती है
इस तरह के अनगिनत झूठ
शत्रु  होते हैं सच के,
भ्रूणहत्या की तरह सच भी
मार दिया जाता है
पैदा होने से पहले!

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मेरी  भूख  है  मेरी प्यास है
अल्प पूर्ण का उल्लास है
खालीपन का अहसास है
कोमल है, कुछ कठोर  है
पर दुःख ही दोनों छोर है
लोग कहेंगे  कविता है
लेकिन
ये मेरे अंदर का शोर है

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मेरे पापा ने बताया है
कि उनके बाबा कहा करते थे
ये मेरे खेत हैं ये खलिहान
ये मेरा घर है ये मेरे संबंध,
जो असल में उनका था ही नहीं,
उनका ही नहीं , यहाँ जो
कुछ भी है वह किसी का भी
नहीं है,
ज़िंदगी एक अजीब वहम है
और इसी वहम को समझने में
गुज़र जाता है
80-90 साल का सफर,और
देह फिर हो जाती है मिट्टी

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मेरे पैदा होने से पहले
गाँव में पड़ोसी से झगड़ा हुआ होगा
नाली,पनारा या चबूतरे को लेकर
बचपन में मुझे बताया गया कि
ये अपना दुश्मन है, ये अपना दोस्त
17-18 वर्ष, मैं उन्हें वैसा ही मानता रहा
लेकिन जब मैं बड़ा हुआ तो शहर आया
शहर आकर मैंने देखा कि
यहाँ कोई किसी का न दोस्त है न दुश्मन
दोस्त ही दुश्मन है, दुश्मन ही दोस्त
यहाँ कुछ स्थिर नही  है
अपने मतलब के साथ लोग यहाँ
पहलू बदलते रहते हैं
ज्यादातर लोग तलवार लेकर
खड़े हैं कि कब आपकी गर्दन झुके
और वे उसे धड़ से अलग कर दें!

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मुल्क़ में कुछ क़त्लखाने थे किसी सरकार में
किसी की सरकार में कुछ और बढ़ गए
फिर किसी की सरकार में कुछ कम हुए
और फिर किसी की सरकार में सारा मुल्क़ ही
एक कत्लखाना बन गया,
यह एक क्रम है और यह ऐसा ही चलता रहेगा,
मगर ये ग़रीब आदमी,
जो हमेशा से बनता आया है और बनता रहेगा
बलि का बकरा?
गज़ब की बात तो यह है कि यही बकरे
तय करते हैं कि सरकार किसकी बनेगी!


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मैं इंसान हूँ झूठ है
मैं शैतान हूँ झूठ है
पारसी,ईसाई, हिन्दू
मुसलमान हूँ ये भी झूठ है
हर संबंध झूठ है
हर व्यवहार झूठ है
सुनहरे ख़्वाब के मानिंद
ये  संसार  झूठ  है
रस्ता भी झूठ  है
मंज़िल भी झूठ है
भीतर भी झूठ है
बाहर  भी झूठ है
क्योंकि सच के हिस्से में
कोई ज़िन्दगी नहीं होती है
इस तरह के अनगिनत झूठ
शत्रु  होते हैं सच के,
भ्रूणहत्या की तरह सच भी
मार दिया जाता है
पैदा होने से पहले!

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मेरी  भूख  है  मेरी प्यास है
अल्प पूर्ण का उल्लास है
खालीपन का अहसास है
कोमल है, कुछ कठोर  है
पर दुःख ही दोनों छोर है
लोग कहेंगे  कविता है
लेकिन
ये मेरे अंदर का शोर है

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मेरे पापा ने बताया है
कि उनके बाबा कहा करते थे
ये मेरे खेत हैं ये खलिहान
ये मेरा घर है ये मेरे संबंध
असल में उनका था ही नहीं,
उनका ही नहीं , यहाँ जो
कुछ भी है वह किसी का भी
नहीं है,
ज़िंदगी एक अजीब वहम है

और इस वहम को समझने में

बीत जाता है 80-90 साल का सफर 

और फिर ये देह हो जाती है मिट्टी !

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मेरे पैदा होने से पहले
गाँव में पड़ोसी से झगड़ा हुआ होगा
नाली,पनारा या चबूतरे को लेकर
बचपन में मुझे बताया गया कि
ये अपना दुश्मन है, ये अपना दोस्त
17-18 मैं उन्हें वैसा ही मानता रहा
लेकिन जब मैं बड़ा हुआ तो शहर आया
शहर आकर मैंने देखा कि
यहाँ कोई किसी का न दोस्त है न दुश्मन
दोस्त ही दुश्मन है, दुश्मन ही दोस्त
यहाँ कुछ स्थिर नही  है
अपने मतलब के साथ लोग यहाँ
पहलू बदलते रहते हैं
ज्यादातर लोग तलवार लेकर
खड़े हैं कि कब आपकी गर्दन झुके
और वे उसे धड़ से अलग कर दें!




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ये पानी  हो गया डिजिटल  वो  दाना  हो गया  डिजिटल

बची  है भूख  बस फिजिकल, कमाना हो गया डिजिटल,


न अब   जज़्बात  जिंदा  हैं, न  अब  इंसान  जिंदा  है

मशीनों   का  इलाका   है,    ज़माना  हो  गया  डिजिटल,


हर इक  आफ़त   गरीबों के,  गली-घर  से  गुज़रती  है

सियासतदान   हाँथों   का    निशाना   हो  गया  डिजिटल,


बदलने  का  मुझे  ग़म  है, दिले-ग़म   क्यों  नहीं  बदला

के जब  इस ज़िंदगी  का  हर  फ़साना   हो  गया  डिजिटल,


सभी  किरदार, मोबाइल    के   ज़रिए   गुफ़्तगू   करते

कहानी  के  सफ़र  में   आना-जाना  हो  गया  डिजिटल!




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अब खुद तक मुझको आना है

पर  राह  में    एक   ज़माना  है,


तन्हाई   ही    है   दूर   तलक़

दुनियाँ    की   भीड़   बहाना है,


दिल  नें  खोया  है  इतना कुछ

अब  और  नहीं  कुछ  पाना है,


है  प्यास बहुत   हर  मन्ज़र में

दाने    का   भूखा     दाना   है


जीत की  इतनी  ज़िद भी ना कर

जब   हार   के  सब कुछ जाना है,


मालूम  जिसे हो  सब  पहले से

फिर  उसको  क्या  समझाना  है,


तेरे   दर    आया,  है  क़िस्मत

राही   का     कौन  ठिकाना   है!







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