धार्मिकता

मानव सभ्यता की हर सदी में धार्मिकता का प्रभाव रहा है
जहाँ एक तरफ भौतिकता से ज्ञान का प्रवाह तो हुआ तो दूसरी तरफ मानसिकता स्थिर होती चली गई,
मग़र सफ़र वही रहा ( बीज से बृक्ष ) तक का
बीज अंकुरित हुआ, पौधा बड़ा हुआ, फूल फल आए, बहार आई पतझड़ आए, बंजर हुए, फिर बरसात आई फिर हरियाली खिली,
धार्मिकता ईश्वर का खौफ़ दिखाए हर सदी में अपना रंग बदलती रही है
कट्टरपंथी धर्मिक आकाओं ने धार्मिकता को हथियार के रूप में सदैव इस्तेमाल किया है और करते भी आ रहे हैं ताकि वे अपनी जड़ता को बरकरार रख सकें , वहीं ज्ञान  भौतिकता के क्षेत्र से कदम बढ़ाता हुआ सामने आ रहा है
यह जो बीच का रिक्त स्थान है , यह भी प्रत्येक क्षण संघर्ष शील रहा है
इसी क्षण पर शासन स्थापित करने के लिए अनेकों प्रयत्न होते रहे हैं
(युद्ध, नरसंहार) कुछ विचार धाराएं चाहतीं हैं यह रक्तपात हो ,कुछ विचार धाराएं दुनियाँ को इस रक्तपात से बचाना चाहती हैं
तर्क और ज्ञान से ये सही को ग़लत, ग़लत को सही बनाती आईं हैं
तमाम फ़ेर बदल होते आ रहे हैं और आगें भी होते रहेंगे,
मगर सफ़र वही रहेगा (बीज से बृक्ष) तक का

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